top of page

श्री राम के प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर श्री रतनेश्वर झा, ऋचा झा के पिताजी के द्वारा रचित

Updated: Jan 28



बॅट गये सभी सनातन के लोग, जब दुर्बुद्धि से दुःख द्वंदों में|

अपना अपना उत्कर्ष जता कर, रख दिया राम को वितण्डों में ||

हो गए छुब्ध दुर्दशा देख, जब राम यहां के लोगों का|

जो करने लगे प्रहार स्वयं ही, स्वयं ही अपने बंधू का ||


स्वयं के शत्रु बन गए स्वयं ही, खो गया विचार जब वेदों का|

ब्रह्म तत्व का ज्ञान भुला कर, तत्ववेक्ता  बन गए अज्ञानीसा||

बॅट गये विविध पंथों में जब, ज्ञानी विज्ञानी सनातनियों का|

जैन बुध बन गए स्वयं ही, घातक  वेद पुराणों का।|


राम के अंतःपुर में ही जब, धड़क उठी ज्वाला अपनों ही का।

क्षुब्ध-बिक्षुब्ध  हो गए राम फिर, दुर्दशा देख सनातनियों का।|

भरसक प्रयास किया राम ने, संगठित समाज को करने का|

किया प्रगट ज्ञानी विज्ञानी, शंकराचार्य से विद्वानों का||


काल खंड के कलरब में, फिर चला प्रचार कुछ संतों का|

राम मुदित मन होकर फिर, आ गए अयोध्या विचार कर रहने का||

किन्तु चला ना अधिक समय तक, संतुलन विचार सनातनियों का|

फिर से कलह उत्पन्न हो गया, राज समाज के ब्यभिचारों का||


पड़ा प्रभाव जब आर्यावर्त  में, राज समाज के दुष्कर्मों का|

टूट टूट कर बिखर गया फिर, संगठन समाज के उत्कर्षों का||

आगये आतताइयों के समूह फिर, आर्यावर्त के पवन प्रांगण में|

नष्ट-विनष्ट  फिर कर डाले वे, वेद पुराण सद्दग्रंथों का||


लगे लूटने विविध प्रकार से, अस्मिता हमारी माँ बहनों का|

बहु बेटियां ग्रास बन गई, क्रूर यवन के हाथों का||

त्राहि त्राहि मच गया यहां पर, है तांडव मचा अत्याचारों का|

कोई नहीं बचाने  वाला, रह गया नारियों के अस्मिता का||


अब तक सदियों से प्रभु राम ने, देख दुष्कर्म हम लोगों का|

छोड़ दिया अस्सहाय सभी क़ो, ये सब कुछ ही  सेहने क़ो||

किन्तु दिन दयालु प्रभु श्री राम ने, पुनः हमे है प्राश्रय  दिया|

कर के विचार दयार्द्र  भाव से, फिर से अयोध्या में आने का||


यह कैसा दुर्भाग्य आज फिर, अहो यहाँ अज्ञान तिमिर में|

बटकर बैठे है हम सब फिर, पड़कर मोहाछन्न अज्ञान में||

संत असंतसे बने हुए है, विद्वान मुर्ख सी बाते करते|

ब्रह्म क़ो जो है समझ ना पाया, ब्रह्मवेक्ता  अपने क़ो कहते ||


तत्वज्ञान का ज्ञान नहीं है, तत्ववेक्ता  बनकर हैं  बैठे|

अपना ही उत्कर्ष सिद्धि में, मोहाछन्न होकर हैं  बैठे||

ग्रह नक्षत्र और तिथि अयन का, भला विचार क्या राम हैं  करते|

संवत्सर के कालखंड क़ो, राम भला क्या कभी देखते||


अपने जन मानस के प्रति तों, सदा उदार बने हैं  रहते|

नहीं प्रयोजन अन्य उन्हें कुछ, दुःखदाह  मिटाने  को  वे तत्पर रहते ||

राजनीती की होड़  मची है, क्या सत्ता क्या संतों में|

अपने अपने ही स्वभावसे, सब जड़े हुए हैं अवचेतन में||


ऐ परमहंस अज्ञान अंध सब, अपने अंतर की दृष्टि खोलो|

देखो राम पधार रहे है, पुनः अयोध्या के प्रांगण में||

जागो मेरे बंधू बाँधब, हो तुम सपूत सनातन के|

मातृभूमि माँ भारत माता की, आँखें अनुरंजित है अश्रू बिंदु से||


आदि पिता हम सब  के ही तो राम ब्रह्म अनामय अनंत हैं |

माता सीता क्षमाशील हो, है देख रही दृग अश्रु बिंदु से||

सादर सुद्ध  विचार से अब तो, जो खंड बचा है भारत माता का |

साकेतपुरी ही समझ लो इसको, इस अबषिश्ट  भारत भूमि को।|


आने दो प्रभु श्री राम चंद्र को, स्वागत में सब तत्पर हो जाओ।

हृदय अयोध्या समझ लो अपना, सीता राम मय सब हो जाओ।|

सीता राम मय सब जग्ग जानी|

करउं  प्रणाम जोरि जुगपाण।|

58 views0 comments

Recent Posts

See All

Comments


bottom of page